कोरबा। कोरबा जिले के करतला थाना में पदस्थ थाना प्रभारी निरीक्षक कृष्ण कुमार वर्मा को कथित रूप से थाना क्षेत्र के जंगल में जुआ खिलवाने के आरोप में निलंबित किए जाने के बाद अब यह मामला नया मोड़ लेता नजर आ रहा है। निलंबन आदेश जारी होते ही न केवल पुलिस महकमे में, बल्कि आमजन और संबंधित इलाकों में भी तरह–तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सूत्रों के अनुसार, जिस स्थान पर जुआ पकड़े जाने का दावा किया गया, वास्तविक घटना उससे अलग बताई जा रही है। महकमे के अंदरखाने से निकलकर आई जानकारी के मुताबिक, जुआ शुक्रवार सुबह करीब 10 बजे रजगामार के जंगल में पकड़ा गया था, जहां कुछ जुआरियों के साथ लगभग 10 लाख रुपये नगद बरामद किए जाने की बात कही जा रही है। इसके बाद कथित रूप से इस पूरे मामले को करतला थाना क्षेत्र के कलगामार–भेलवाटार जंगल में शिफ्ट कर दिया गया।
चर्चा यह भी है कि टीम में शामिल कुछ लोगों द्वारा पकड़े गए जुआरियों की संख्या बढ़ाने के लिए अन्य लोगों को फोन कर मौके पर बुलाया गया और बाद में बरामदगी की रकम को घटाकर मात्र ढाई लाख रुपये दिखाया गया। आरोप है कि यह सब करतला थाना प्रभारी को साजिशन और दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाने की लंबे समय से चली आ रही कोशिश का हिस्सा था, जिसे अब अंजाम दिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर जुआ पकड़ा गया, तो फड़ संचालक या सरगना अब तक गिरफ्त से बाहर क्यों है? क्या पुलिस की मुखबिरी व्यवस्था इतनी कमजोर है कि मुख्य आरोपी बच निकलते हैं और केवल छोटे-मोटे जुआरी ही पकड़े जाते हैं?
इसके साथ ही पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। जिले के अन्य थाना और चौकी क्षेत्रों में जुआ, डीजल चोरी, कोयला चोरी, अवैध कबाड़, नशे का कारोबार जैसी गतिविधियां लगातार सामने आ रही हैं। कबाड़ के अवैध कारोबार के चलते लोहे और तांबे से बने सामानों की चोरी में भी तेजी आई है। कई थाना क्षेत्रों में अवैध नशे की बिक्री कथित तौर पर नियंत्रण से बाहर बताई जा रही है।
इतना ही नहीं, हाल के दिनों में कुछ क्षेत्रों में हत्या जैसी गंभीर वारदातें हुईं, चर्चित मामलों में सवाल अब भी अनसुलझे हैं। एक असफल डकैती के बाद दूसरी डकैती सफल हो जाती है, आरोपी पकड़े जाते हैं लेकिन माल बरामद नहीं होता। इसके बावजूद ऐसे मामलों में किसी प्रकार की कठोर कार्रवाई या निलंबन देखने को नहीं मिलता।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कर्तव्य के प्रति लापरवाही के नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, या फिर चुनिंदा अधिकारियों को ही निशाना बनाया जाता है? निलंबन पहले भी हुए हैं, लेकिन इस बार का निलंबन पुलिस महकमे के भीतर ही संदेह और असंतोष का कारण बन गया है। चर्चा है कि यह कार्रवाई सिर्फ एक अधिकारी पर नहीं, बल्कि खाकी के मनोबल और विभाग की छवि पर भी सीधा असर डाल रही है।
अब देखना यह होगा कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होती है या नहीं, और क्या साजिश के आरोपों की परतें खुल पाती हैं, या मामला यहीं थम जाएगा।











