बिलासपुर | CGTMN News
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि अनुकंपा नियुक्ति नीति में दूसरी पत्नी होने की जानकारी देना अनिवार्य नहीं है, तो केवल इसी आधार पर नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती। साथ ही अदालत ने कहा कि किसी भी कर्मचारी की सेवा समाप्त करने से पहले उसे सुनवाई का अवसर देना प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत है।
क्या है पूरा मामला?
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले की मरवाही तहसील में पदस्थ चपरासी गोपाल सिंह पोट्टम का 23 जुलाई 2020 को सेवा के दौरान निधन हो गया था। इसके बाद उनकी पत्नी मीराबाई पोट्टम ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। आवेदन स्वीकार होने पर 16 दिसंबर 2021 को उन्हें चपरासी पद पर नियुक्त कर दिया गया।
हालांकि, 4 अगस्त 2022 को कलेक्टर ने यह कहते हुए उनकी नियुक्ति रद्द कर दी कि उन्होंने आवेदन के समय यह जानकारी नहीं दी कि वह मृत कर्मचारी की दूसरी पत्नी हैं।
हाईकोर्ट पहुंचा मामला
कलेक्टर के आदेश को चुनौती देते हुए मीराबाई पोट्टम ने अधिवक्ता भारत लाल डेम्ब्रा के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मृत कर्मचारी की पहली पत्नी का वर्ष 2006 में निधन हो चुका था। इसके बाद वर्ष 2007 में मीराबाई से विधिवत विवाह हुआ और दोनों लगभग 13 वर्षों तक पति-पत्नी के रूप में साथ रहे। साथ ही यह भी बताया गया कि अनुकंपा नियुक्ति नीति-2013 में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि आवेदक को पहली या दूसरी पत्नी होने की जानकारी देना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि—
अनुकंपा नियुक्ति नीति में दूसरी पत्नी होने की जानकारी देना अनिवार्य नहीं है।
पहली पत्नी की मृत्यु के बाद हुआ विवाह वैध था और उस पर कभी कोई कानूनी आपत्ति नहीं की गई।
सेवा अभिलेख में हेरफेर का आरोप भी याचिकाकर्ता पर सिद्ध नहीं हुआ।
बिना सुनवाई का अवसर दिए नियुक्ति समाप्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
सेवा में बहाली का आदेश
हाईकोर्ट ने कलेक्टर द्वारा 4 अगस्त 2022 को जारी नियुक्ति निरस्तीकरण आदेश को रद्द करते हुए मीराबाई पोट्टम को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया। साथ ही प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से वरिष्ठता एवं अन्य सेवा लाभ देने का भी आदेश दिया।
हालांकि, अदालत ने बैक वेज (पिछले वेतन) देने से इनकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सकीं कि इस अवधि में वे पूरी तरह बेरोजगार थीं।
यह फैसला अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में प्राकृतिक न्याय और नियुक्ति नीति की व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।












