ढेलवाडीह से शुरू हुई आदर्श ग्राम की पहल, अब कुसमुंडा क्षेत्र के विस्थापित गांवों की ओर भी उठी उम्मीदें
कोरबा। कोयला उत्खनन से प्रभावित गांवों को आदर्श ग्राम के रूप में विकसित करने की दिशा में कोरबा कलेक्टर कुणाल दुदावत ने पहल शुरू की है। कलेक्टर ने हाल ही में ढेलवाडीह, जवाली, डोंगरी, रंजना, बतारी और बेलटिकरी जैसे खनन प्रभावित गांवों का दौरा किया। ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी समस्याएं सुनीं और गांवों की प्राथमिक जरूरतों की समग्र कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए।
प्रशासन ने सड़क, पेयजल, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य, आंगनबाड़ी और आजीविका जैसे बुनियादी मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात कही है। डीएमएफ से स्वीकृत कार्यों की समीक्षा कर अधूरे कार्यों को जल्द पूरा करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
लेकिन इसी पहल के बीच कुसमुंडा SECL क्षेत्र के खनन प्रभावित और विस्थापन की प्रक्रिया से जुड़े गांवों को लेकर भी बड़ा सवाल खड़ा होता है।
कुसमुंडा के प्रभावित गांवों की बारी कब?
कुसमुंडा क्षेत्र में खोडरी, पाली, पड़निया, रिसदी, सोनपुरी, जटराज और गेवरा बस्ती जैसे गांव लंबे समय से खनन गतिविधियों के प्रभाव, भारी वाहनों की आवाजाही, सड़क, पानी, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं को लेकर चर्चा में रहे हैं।
इन क्षेत्रों की समस्याओं को लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार आवाज उठती रही है। ऐसे में अब ग्रामीणों की निगाहें इस बात पर हैं कि आदर्श ग्राम बनाने की यह पहल कुसमुंडा क्षेत्र के प्रभावित गांवों तक कब पहुंचेगी?
कलेक्टर साहब से सीधे सवाल
- कुसमुंडा SECL क्षेत्र के खनन प्रभावित गांवों का व्यापक निरीक्षण कब होगा?
- खोडरी, पाली, पड़निया, सोनपुरी, जटराज और गेवरा बस्ती जैसे गांवों को आदर्श ग्राम की योजना में कब शामिल किया जाएगा?
- जिन गांवों से कोयला खनन के कारण विस्थापन और पर्यावरणीय प्रभाव जुड़ा है, वहां सड़क, पानी, बिजली और शिक्षा जैसी सुविधाओं की स्थिति की समीक्षा कब होगी?
- क्या इन गांवों के लिए अलग से समयबद्ध विकास कार्ययोजना तैयार की जाएगी?
- डीएमएफ की राशि का प्रत्यक्ष लाभ खनन प्रभावित परिवारों और गांवों तक पहुंचाने के लिए प्रशासन की ठोस कार्ययोजना क्या है?
सिर्फ घोषणा नहीं, जमीन पर दिखे बदलाव
कलेक्टर ने प्रभावित गांवों में ग्रामीणों के साथ बैठकर उनकी समस्याएं सुनने और पंचायतों से समग्र कार्ययोजना मांगने की बात कही है।
यही मॉडल अगर कुसमुंडा क्षेत्र में भी लागू होता है तो ग्रामीणों को उम्मीद है कि सड़क, पेयजल, स्कूल, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी समस्याओं को एक साथ लेकर स्थायी समाधान की दिशा में काम हो सकता है।
सवाल विरोध का नहीं, बराबरी के विकास का है।
जब कोयला उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कुसमुंडा क्षेत्र के गांव खनन के प्रभावों का सामना कर रहे हैं, तो क्या उन्हें भी “आदर्श ग्राम” की सूची में प्राथमिकता मिलनी चाहिए?
कलेक्टर कुणाल दुदावत से यही सीधा सवाल है—कुसमुंडा क्षेत्र के प्रभावित गांवों की चौपाल कब लगेगी?
“जहां से कोयला निकल रहा है, क्या वहां रहने वाले गांवों तक विकास भी पहुंचेगा?”
