August 4, 2026

0.06 एकड़ भूमि वाले विस्थापित के पक्ष में हाई कोर्ट, SECL का आदेश रद्द”भूमि अधिग्रहण की पुरानी नीति से तय होगा रोजगार का अधिकार

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हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: भूमि अधिग्रहण के समय की नीति से मिलेगा रोजगार, SECL का आदेश रद्द

कोरबा। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने SECL की गेवरा परियोजना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में भूमि विस्थापितों के पक्ष में अहम निर्णय दिया है। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने सरोजनी बाई राठौर बनाम SECL (WPS No. 5374/2022) में स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण के बाद बनाई गई नई पुनर्वास नीति लागू नहीं की जा सकती। रोजगार का दावा उसी पुनर्वास नीति के अनुसार तय होगा, जो भूमि अधिग्रहण के समय लागू थी।

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता की ग्राम नराईबोध स्थित 0.06 एकड़ (लगभग 2.43 डिसमिल) भूमि वर्ष 2009–2010 में गेवरा परियोजना विस्तार के लिए अधिग्रहित की गई थी। बाद में SECL ने Coal India Limited की वर्ष 2012 की पुनर्वास नीति का हवाला देते हुए रोजगार का दावा अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उसमें 2 एकड़ से कम भूमि वालों को रोजगार का प्रावधान नहीं था।

हाई कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2009–2010 में जब भूमि अधिग्रहित हुई, उस समय राज्य की पुनर्वास नीति लागू थी। इसलिए बाद में लागू की गई 2012 की नीति के आधार पर याचिकाकर्ता का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।

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कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय Pyarelal vs. SECL (WPC No. 3076/2016) का हवाला देते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण के समय प्राप्त अधिकार बाद की नीति से समाप्त नहीं किए जा सकते। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि SECL ने स्वयं स्वीकार किया कि प्यारेलाल मामले के निर्णय को उच्च न्यायालय से ऊपर किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी गई और वह अंतिम (Final) हो चुका है।

अदालत ने SECL द्वारा 13 मई 2022 को पारित अस्वीकृति आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के रोजगार के दावे पर भूमि अधिग्रहण की तिथि पर लागू पुनर्वास नीति के अनुसार 45 दिनों के भीतर पुनर्विचार किया जाए।

यह निर्णय SECL के विभिन्न क्षेत्रों—विशेषकर गेवरा, कुसमुंडा और दीपका परियोजनाओं—के उन भूमि विस्थापित परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनके रोजगार के दावे बाद में लागू की गई नीति के आधार पर अस्वीकार किए गए थे।

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