गीता पढ़ो, वरना आने वाली पीढ़ी अपना धर्म भूल जाएगी

गीता पढ़ो, वरना आने वाली पीढ़ी अपना धर्म भूल जाएगी

गीता ज्ञान – आज की पीढ़ी तकनीक, आधुनिकता और भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर इतनी तेज़ी से बढ़ रही है कि अपने मूल धर्म, संस्कृति और जीवन मूल्यों से दूर होती जा रही है। धर्म केवल पूजा-पाठ या परंपरा का नाम नहीं, बल्कि यह हमारी जीवनशैली है। भगवद्गीता हमें यही सिखाती है कि जीवन को संतुलन, सत्य और कर्तव्य के आधार पर कैसे जिया जाए।

गीता में कहा गया है कि –

आत्मा अमर है, शरीर नश्वर। यह ज्ञान आने वाली पीढ़ी को डर और मोह से मुक्त करता है।

कर्म करो, फल की चिंता मत करो। यह शिक्षा उन्हें मेहनती, जिम्मेदार और निस्वार्थ बनाएगी।

धर्म का पालन ही जीवन का असली कर्तव्य है। धर्म यहाँ जाति या पंथ नहीं बल्कि “सत्य, कर्तव्य और न्याय” का प्रतीक है।

अगर नई पीढ़ी गीता का अध्ययन नहीं करेगी, तो वे केवल भौतिकता में उलझ कर स्वार्थी, अस्थिर और भ्रमित हो जाएंगे। यही कारण है कि आज नशा, अपराध और मानसिक तनाव बढ़ रहे हैं – क्योंकि जीवन के आध्यात्मिक आधार को लोग भूल रहे हैं।

गीता का अध्ययन आने वाली पीढ़ी को न सिर्फ धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक और तार्किक सोच भी देगा। आधुनिक मैनेजमेंट, साइकोलॉजी और लीडरशिप की किताबें भी गीता से प्रेरणा ले रही हैं।

अतः यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी अपने धर्म, संस्कार और पहचान को न भूले, तो उन्हें बचपन से ही गीता पढ़ाना और उसके सिद्धांतों को जीवन में उतारना ज़रूरी है।
गीता केवल हिंदुओं की नहीं, बल्कि मानवता की मार्गदर्शिका है। इसे अपनाकर ही हम धर्म, संस्कृति और जीवन मूल्यों को सुरक्षित रख सकते हैं।