“करोड़ों का DMF, फिर भी कोरबा की सड़कें बदहाल! मंत्री-अफसरों के सामने विकास के दावों की खुली पोल”
🚨 करोड़ों के DMF के बावजूद कोरबा शहर की सड़कें बदहाल, आखिर जिम्मेदार कौन?
जहां रोज मंत्री, विधायक और बड़े अधिकारी पहुंचते हैं, वहीं सड़कों की दुर्दशा विकास के दावों पर सवाल खड़े कर रही
कोरबा। कोयले की काली धरती से देश की अर्थव्यवस्था को ऊर्जा देने वाला कोरबा आज अपनी ही सड़कों की बदहाली से जूझ रहा है। DMF जैसे बड़े विकास फंड की उपलब्धता के बावजूद शहर की कई सड़कें टूट चुकी हैं, जगह-जगह गड्ढे हैं और बारिश में सड़कें नाले में तब्दील होती नजर आती हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन सड़कों की जिम्मेदारी किसकी है?
जिस शहर में रोजाना मंत्री, विधायक, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी अपने कार्यालयों तक पहुंचते हैं, उसी शहर की सड़कों की यह हालत आखिर उनकी नजरों से कैसे बच रही है?
💰 DMF के करोड़ों रुपये… फिर सड़कें क्यों बेहाल?
कोरबा को खनिज न्यास मद यानी DMF से बड़ी राशि प्राप्त होती रही है। इस फंड का उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों में विकास और लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना है।
लेकिन शहर की सड़कों की तस्वीर देखकर एक सीधा सवाल उठता है—
अगर विकास के लिए इतनी बड़ी राशि उपलब्ध है, तो कोरबा शहर की सड़कें इतनी बदहाल क्यों हैं?
क्या सड़क निर्माण में गुणवत्ता की निगरानी होती है?
क्या निर्माण के बाद उसकी मजबूती की जांच होती है?
क्या ठेकेदारों की जवाबदेही तय होती है?
और सबसे महत्वपूर्ण—बारिश की पहली मार में सड़कें क्यों टूटने लगती हैं?
🌧️ बरसात जाते-जाते सड़क भी बहा ले जाती है!
कोरबा में हर साल बारिश आती है। हर साल सड़कें टूटती हैं। हर साल मरम्मत की जरूरत पड़ती है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हर साल सड़क बनाने और फिर बारिश के बाद उसी सड़क की मरम्मत कराने का सिलसिला ही विकास मॉडल बन गया है?
कई जगह स्थिति ऐसी दिखाई देती है कि सड़क पर पानी जमा होता है, डामर उखड़ता है और कुछ ही समय में बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते हैं।
अगर सड़क निर्माण तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ है, तो बारिश के पानी के साथ सड़क की परत आखिर क्यों बह जाती है?
👀 मंत्री जी, एक बार सड़क पर उतरकर देखिए!
कोरबा के मंत्री लखन लाल देवांगन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से अब जनता यह जानना चाहती है कि शहर की सड़कों की इस स्थिति पर आखिर कब गंभीरता से कार्रवाई होगी?
बड़े-बड़े मंचों से विकास की बातें करना आसान है, लेकिन विकास की असली तस्वीर सरकारी कार्यालयों के वातानुकूलित कमरों में नहीं, बल्कि शहर की टूटी सड़कों पर दिखाई देती है।
मंत्री जी से सवाल है—
क्या आपने इन सड़कों की वर्तमान स्थिति खुद देखी है?
यदि नहीं, तो एक बार बिना प्रोटोकॉल के शहर की इन सड़कों से होकर गुजरिए।
शायद गड्ढों में हिचकोले खाती जनता की परेशानी और विकास के दावों के बीच का अंतर साफ दिखाई देगा।
🏛️ कलेक्टर के दावों की भी परीक्षा
जिला प्रशासन द्वारा समय-समय पर विकास और बेहतर व्यवस्था के दावे किए जाते हैं। लेकिन शहर की जमीनी तस्वीर उन दावों की वास्तविक परीक्षा ले रही है।
कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचने वाले रास्तों की स्थिति यदि ऐसी है, तो आम नागरिकों को यह सवाल पूछने का पूरा अधिकार है कि—
शहर के अंदरूनी इलाकों की सड़कों की निगरानी कौन करता है?
सड़क निर्माण की गुणवत्ता जांचने वाला विभाग कौन है?
निर्माण की तकनीकी स्वीकृति किसने दी?
भुगतान से पहले सड़क की गुणवत्ता किस अधिकारी ने प्रमाणित की?
और सड़क खराब होने पर ठेकेदार के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई?
⚠️ भ्रष्टाचार के आरोप गंभीर, जांच जरूरी
सड़कों की खराब स्थिति को देखकर भ्रष्टाचार की आशंका और आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन किसी अधिकारी, ठेकेदार या संस्था पर भ्रष्टाचार का आरोप बिना दस्तावेजी प्रमाण के तथ्य के रूप में लगाना उचित नहीं होगा।
इसलिए शासन-प्रशासन को चाहिए कि शहर की प्रमुख सड़कों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराए, निर्माण की लागत, ठेकेदार, वर्क ऑर्डर, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करे।
यदि कहीं अनियमितता मिली है तो जिम्मेदारी तय हो और दोषियों पर कार्रवाई हो।
🔥 अब सवाल जनता पूछेगी
कोरबा की सड़कें कब सुधरेंगी?
DMF और अन्य विकास मदों से खर्च होने वाली राशि का सड़क पर कितना असर दिखा?
सड़क बनने के बाद उसकी गारंटी अवधि क्या है?
बारिश में सड़क टूटने पर ठेकेदार से मरम्मत क्यों नहीं कराई जाती?
और सबसे बड़ा सवाल—
“कोरबा को करोड़ों का विकास फंड मिलने के बावजूद शहर की सड़कें इतनी बदहाल क्यों?”
अब जरूरत सिर्फ गड्ढे भरने की नहीं, बल्कि गड्ढों की वजह तलाशने की है।
शासन-प्रशासन को चाहिए कि कागजों में विकास के आंकड़े गिनाने के बजाय एक बार कोरबा की सड़कों पर उतरकर जमीनी हकीकत देखे।
क्योंकि जनता को दावे नहीं, चलने लायक सड़क चाहिए।
